Dr. Sudha Om Dhingra: Two Poems


माँ ने कहा था

 

माँ ने कहा था चली जा परदेस

लगेगा अपना सा देस

बाबा ने कहा था मन पसंद साथी हो जिसका

जंगल में भी मंगल उसका

भैया ने कहा था मीत मिले मन का

सुख, चैन मिले तन का

सबका इसरार, सब का मनोहार

सुनी न मेरी दाद फ़रयाद

पहुँची पिया के देश

पहन अपना वेश

एयरपोर्ट पर वे आये

मुस्कुराए

एक गोरी भी मुस्कुराई

मैं चिलाई

क्या तुम इसे जानते हो?

वे बोले

यह देश, अजनबियों को 'हाय'

और अपनों को 'बाई' कहता है।

मैं इतराई

कैसे देश में आई?

मैंने ज़िद की थी

मत भेजो पश्चिम में

सूरज डूबता है वहाँ

आदमी बस ऊबता है वहाँ

बिजली के स्विच,

कार का चलाना

धूप में नहाना

सब उल्टा है

इस उलट पुलट में मैं खो गई

खो ही तो गई

वह गिल्ली डंडा खेलना

वह कंचों का फोड़ना

वह गीली रेत से कुछ बनाना फिर तोड़ना

सब भूल गई

मेरा बच्चा कहाँ ले पाएगा ख़ुश्बू

भीनी भीनी माटी की

संयुक्त परिवार वाले परिपाटी की

वह तो देखेगा

न चाहते हुए भी देखेगा

सच के घर टूटना

और बच्चों का माँ-बाप को डाइवोर्स देना

मैं ढूंढती हूँ अपना देस

यह तो रहेगा परदेस

कभी न होगा मेरा देस

माँ ने कहा था चली जा परदेस

लगेगा अपना सा देस


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